Thursday, May 13, 2010

वृत्त के केन्द्र

जीवन
का एक दीर्घ वृत्त
जिसमें
समाती हुई दुनिया
चारो
तरफ कई बंदिशें
वृत्त
से कटने का डर
सब
लौट आते वृत्त में
बीच
-बीच में कई त्रिकोण
एक
दूसरे पर शको सुबहा
दो
समानान्तर रेखायें भी
जिनमें
एक दूसरे से
आगे
निकलने की होड़
पर
कहीं नहीं मिलन बिंदु
शकुन्तला
की अंगूठी
अभी
भी मछली के पेट में
रेखा
जो बिंदु से बनी
लक्ष्मण
रेखा की तरह दृढ़
कहीं कोई दूसरी रेखा नहीं
निपट
अकेली
वृत्त
में कई बिंदु पर सब अदृश्य
उनका
पूर्ण समर्पण
दूसरों
को आकार देने में
कुछ
आड़ी -तिरछी रेखायें भी
रोयेदार
कांटे लिये
कष्ट
देना जिनके जीवन का लक्ष्य
कार्य
है लोगों को लड़ाना
और
वृत्त के बाहर जाकर
निहारना
इन्हें
न कोई बंदिश ,

कोई भय ,न चिंता
सबको
हैं अपनी परिधि में समेटे
यही
हैं वास्तव में
वृत्त
के केन्द्र
इनका वही चिरपरिचित अट्टहास
वही शैतानी मुस्कराहट
और इनकी वही त्रिज्या
और
वही सममिति.......................

हर इक धड़कन.......

हरइक धड़कन ही नफरत के नये सांचे में ढ़लती है
मुहब्बतकी जगह तो अब दिलों में कम निकलती है
न जाने अब कहां पर ठौर होगा आशियाना
भी कि दाना ढूढने ये सोचकर चिड़िया निकलती है
भलेही शांति हो गहराई हो दिल के समुंदर
में मगरउसमें तरंगो सी तमन्ना भी मचलती है
इबादतकी जरुरत आज है उनको बहुत ज्यादाकिजिनको
दूसरो की हर खुशी हरदम ही खलती है
अवधके राम राजा हों सभी की है ये अभिलाषा
मगरकैकेयी के दिल में यही इक पीर पलती
है तुम्हारेप्यार की प्यारी तपन ने कोशिशें तो कीं
जमीहै बर्फ दिल पर जो वो साधक कब पिघलती है

अनमोल रहा हूँ ....

हैदिल की बात तुझसे मगर खोल रहा हूँ
मैंचुप्पियों में आज बहुत बोल रहा हूँ
सांसोंमें मुझे तुझसे जो एक रोज मिली
थी वोखुश्बूयें हवाओं में अब घोल रहा हूँ
अबतेरी हिचकियों ने भी ये बात कही है
मैंतेरी याद साथ लिये डोल रहा हूँ
सोनेकी और न चांदी की मैं बात करुंगा
मैंदिल की ही तराजू पे दिल तोल रहा
हूँ चाहोतो मुहब्बत से मुझे मुफ्त ही ले लो
वैसेतो शुरु से ही मैं अनमोल रहा हूँ

स्नेह

घर
बहुत दिन बाद आया बेटा
मां
उसे सीने से लगा लेती है
पूछती
है कैसे रहे ?
कोई
तकलीफ तो नहीं ?
बेटा
नहीं कह कर
मां
के आंचल में छुप जाता है
ठीक
वैसे ही जब बचपन में
मां
की डांट से बचने के लिए
छुपा
करता था....
मां
का ममतामयी आंचल
आज
भींग गया है आंसुओं से
आंचल
में छुपा बेटा
रोक
नहीं पाता अपने को
और
बह पड़ती है
गंगा
जमुनी धारा
नेत्र
के दोनो कूलों से
एक
दूसरे का कर रहे
जलाभिषेक
आंसुओं
से.......
कोई
एक दूसरे को
छोड़ना
नहीं चाहता
बहुत
दिनों के अकेले का दर्द
आज
सामूहिक हो गया है
कौन
हटाये उन्हें कैसे हटें वे
दोनो
की आंखें लाल
पर
आंसू रुकना ही नहीं चाहते
उन्हे
तो बहुत दिनों के बाद
स्नेह
का स्वाद मिला है
बेटा
झट मां के चरण छूता है
मां
उसके माथे को चूमती है...
बेटे
के माथे पर कटे निशान को
याद
कर फिर रो लेती है...
जब
उसके बेटे को लगी थी
कैंची
साइकिल चलाते समय गिरकर चोट
बेटा
मां की फटी साड़ी से
झांकते
बालों को छिपाता है...
पर
अपने आंसू नहीं छिपा पाता
दोनो
की यादें आज हरी हो गई हैं
पा
रहीं हैं पानी दोनो के आंसुओं का
अब
कौन किससे कहे
कौन
किसकी सुने
दोनो
मौन ...नि:शब्द...
बेटे
को अभी मां के लिए
लाई
साड़ी निकालनी है
तो
मां को बेटे के लिए
बूढ़ी
आंखों से बुने ऊनी दस्ताने....
बेटे
को अभी पूछना है
नंदिनी
गाय ने अबकी बाछा दी या बाछी
संवरु
कुत्ता कहां ....?
आज
चौराहे पर नहीं मिला .....
मां
को भी बताना है
मंगरु
के बेटी लाली का गौना हो गया
और
वो चली गई
और
पड़ोस के राय साहब आये थे
कुंडली ,फोटो दे गये हैं...................
......................

माँ उपमा नहीं .....

मां
उपमा नहीं होती
मां ...
हिमालय
से भी
ऊंची
होती है..............
और
धरती से भी बड़ी
लेकिन
पाषाण की तरह
कठोर नहीं होती...
सागर
से भी गहरी होती है
मां
लेकिन
सागर जैसी
खारी नहीं
भगवान
को भी
जन्म
देती है
मां
लेकिन
भगवान की तरह
दुर्लभ
नही होती...
मां
तो वायु से भी ज्यादे
गतिशील
है....
पर
अदृश्य बिल्कुल नहीं
दिखती
रहती है हरदम
हम
सब के बीमार होने पर
गुमसुम
बैठी सिरहाने
माथे
पर हाथ फेरते.....
लम्बी
उम्र की कामना करते ....
यह
शाश्वत सत्य है...
मां
उपमा नहीं हो सकती
क्योंकि
कोई नहीं है
मां
के समान
किससे
करें हम
तुलना
उसकी............
मां
...मां ...होती है
सिर्फ
मां ....
मां
उपमा
नहीं होती
.........................................
मृत्युंजय साधक
9891375604