जीवन
का एक दीर्घ वृत्त
जिसमें
समाती हुई दुनिया
चारो
तरफ कई बंदिशें
वृत्त
से कटने का डर
सब
लौट आते वृत्त में
बीच
-बीच में कई त्रिकोण
एक
दूसरे पर शको सुबहा
दो
समानान्तर रेखायें भी
जिनमें
एक दूसरे से
आगे
निकलने की होड़
पर
कहीं नहीं मिलन बिंदु
शकुन्तला
की अंगूठी
अभी
भी मछली के पेट में
रेखा
जो बिंदु से बनी
लक्ष्मण
रेखा की तरह दृढ़
कहीं कोई दूसरी रेखा नहीं
निपट
अकेली
वृत्त
में कई बिंदु पर सब अदृश्य
उनका
पूर्ण समर्पण
दूसरों
को आकार देने में
कुछ
आड़ी -तिरछी रेखायें भी
रोयेदार
कांटे लिये
कष्ट
देना जिनके जीवन का लक्ष्य
कार्य
है लोगों को लड़ाना
और
वृत्त के बाहर जाकर
निहारना
इन्हें
न कोई बंदिश ,
न
कोई भय ,न चिंता
सबको
हैं अपनी परिधि में समेटे
यही
हैं वास्तव में
वृत्त
के केन्द्र
इनका वही चिरपरिचित अट्टहास
वही शैतानी मुस्कराहट
और इनकी वही त्रिज्या
और
वही सममिति.......................
Thursday, May 13, 2010
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