हरइक धड़कन ही नफरत के नये सांचे में ढ़लती है
मुहब्बतकी जगह तो अब दिलों में कम निकलती है
न जाने अब कहां पर ठौर होगा आशियाना
भी कि दाना ढूढने ये सोचकर चिड़िया निकलती है
भलेही शांति हो गहराई हो दिल के समुंदर
में मगरउसमें तरंगो सी तमन्ना भी मचलती है
इबादतकी जरुरत आज है उनको बहुत ज्यादाकिजिनको
दूसरो की हर खुशी हरदम ही खलती है
अवधके राम राजा हों सभी की है ये अभिलाषा
मगरकैकेयी के दिल में यही इक पीर पलती
है तुम्हारेप्यार की प्यारी तपन ने कोशिशें तो कीं
जमीहै बर्फ दिल पर जो वो साधक कब पिघलती है
Thursday, May 13, 2010
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